Swatantryaveer Savarkar defamation case: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 4 अप्रैल को लखनऊ में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित स्वातंत्र्यवीर सावरकर मानहानि मामले में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राहत देने से इनकार कर दिया।
राहुल गांधी को सजा दिलाकर रहेंगेः याचिकाकर्ता अधिवक्ता नृपेंद्र पांडेय
न्यायालय के फैसले के बाद याचिकाकर्ता अधिवक्ता नृपेंद्र पांडेय ने हिंदुस्थान पोस्ट से बात करते हुए कहा, “राहुल गांधी ने महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में ऐसी बातें कर केवल उनका ही नहीं, पूरे देश और सभी स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान किया है। हम उनको सजा दिलाकर ही रहेंगे। धारा 153 ए के तहत राहुल गांधी को तीन साल की सजा दिलाने के लिए हमारी लड़ाई जारी रहेगी।
अधिवक्ता पांडेय ने कहा कि हम सर्वोच्च न्यायालय में कैविएट याचिका दाखिल करेंगे। उसके बाद शीर्ष न्यायालय को कोई भी फैसला सुनाने से पहले हमारा पक्ष सुनना होगा। मुझे विश्वास है कि अगर राहुल गांधी सर्वोच्च न्यायालय में जाते हैं तो यहां भी उनको झटका लगेगा और धारा 153 ए के तहत उन्हें सजा के साथ जुर्माना भी भरना पड़ेगा।
धारा 153ए में प्रावधान
आईपीसी की धारा 153ए भारत के विविधतापूर्ण समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में कार्य करती है। यह उन स्थितियों में कानूनी सहायता की आवश्यकता को दर्शाती है, जिसमें घृणास्पद भाषण और भड़काऊ कार्य सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने का का काम करता है।
याचिका में क्या है?
अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे की याचिका में कहा गया है, “राष्ट्रवादी विचारधारा के महान नेता क्रांतिवीर विनायक दामोदर सावरकर देश की स्वतंत्रता के इतिहास में एक निडर और महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचारों को सहन किया। इस स्थिति में राहुल गांधी ने वीर सावरकर के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानित किया।”
राहुल गांधी ने दी थी समन के आदेश को चुनौती
बता दें कि राहुल गांधी ने पिछले साल दिसंबर में उन्हें आरोपी के तौर पर समन करने के अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अपनी याचिका में गांधी ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसमें शिकायतकर्ता अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे द्वारा जून 2023 में उनकी शिकायत खारिज किए जाने के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका को अनुमति दी गई थी।
न्यायालय की टिप्पणी
4 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि गांधी के पास धारा 397 सीआरपीसी (धारा 438 बीएनएसएस) के तहत सत्र न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय में जाने का विकल्प उपलब्ध है। इस टिप्पणी के साथ ही न्यायालय ने उनकी याचिका का निपटारा कर दिया।
पिछले वर्ष न्यायालय में आया था मामला
बता दें कि गांधी को पिछले साल दिसंबर में न्यायालय ने अभियुक्त के तौर पर तलब किया था, जिसमें पाया गया था कि गांधी ने अपने भाषण के माध्यम से और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पर्चे के जरिए समाज में नफरत और दुर्भावना फैलाई थी, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि सावरकर अंग्रेजों के सेवक थे और उन्होंने अंग्रेजों से पेंशन भी ली थी।
लखनऊ के अतिरिक्त सिविल कोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
इससे पहले लखनऊ के अतिरिक्त सिविल जज आलोक वर्मा ने दिसंबर में पारित अपने आदेश में भी राहुल गांधी के खिलाफ फैसला दिया था। माननीय जज ने अपने फैसले में कहा था, “प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहले से छपे पर्चे बांटना दर्शाता है कि राहुल गांधी ने समाज में नफरत और वैमनस्य फैलाकर राष्ट्र की बुनियादी विशेषताओं को कमजोर करने का काम किया है।”